2000

अध्यक्ष, अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक

Amit Shah's Introduction
  • अमित भाई सिर्फ 36 वर्ष की उम्र में ADCB के सबसे युवा अध्यक्ष बने।
  • जब उन्होने ADCB की कमान सम्भाली बैंक 20.28 करोड के घाटे में था और जमाकर्ताओं को वर्षो से लाभांश नहीं दिया गया था। अमित भाई ने बैंक के पुनरूद्धार का प्रस्ताव रखा। उनके इस प्रस्ताव का सार्वजनिक उपहास किया गया। परन्तु अपनी कार्यकुशलता के जरिये सिर्फ एक साल में अमित भाई ने न सिर्फ 20.28 करोड का घाटा पूरा किया बल्कि बैंक को 6.60 करोड के लाभ में लाकर 10 प्रतिशत लाभांश का वितरण भी किया। इस सफलता को जारी रखते हुये अगले साल ’’शेयर होल्डर्स’’ को 13.77 प्रतिशत का लाभांश मिला। उनके कार्यकाल में ADCB गुजरात का नबंर 1 बैंक बना।
  • उनके कार्यकाल के दौरान बैंक के कार्य क्षेत्र का विस्तार करके सरकारी सुरक्षा निधि को क्रेडिट के द्वारा बैंक ने 262 प्रतिशत लाभ का इतिहास रचा।
  • इसी दौरान स्टेट बैंक आफ इंडिया ने सहकारी बैंको की FD पर दी जाने वाली ओवर ड्राफ्टिंग की सुविधा बन्द कर दी थी जिससे सहकारिता आन्दोलन के भविष पर प्रश्नचिन्ह लग गया। परन्तु अमित भाई की लगन और अथक प्रयासो के कारण सिर्फ 48 घंटों में स्टेट बैंक को अपना निर्णय वापस लेना पडा़। जिसका लाभ ADCB के साथ साथ अन्य सहकारी बैकों को भी मिला।
  • कृषि से जुडे मजदूरों और किसानों की वेदना समझते हुए अमित भाई ने इस वर्ग को दिये जाने वाली 2 हजार रुपये की बीमा सुरक्षा को 10 हजार और 500 वाली को 2500 किया।
Amit Shah's Introduction
  • अमित भाई के कार्यकाल के दौरान गुजरात के माधेपुरा बैंक के बंद हो जाने की वजह से 3 लाख खातेदारों, डिपोजिटर्स और सहकारी बैंकों के 800 करोड़ रूपये डूबने की कगार पर थे। इस घटना ने गुजरात के सभी सहकारी बैंकों की विश्वसनियता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया। परिणामस्वरूप सहकारी बैंकों से जुड़े लाखों लोगों ने बैंक से पैसा निकालने की कोशिश की जिससे गुजरात में सहकारी बैंकों का अस्तित्व खतरे में आ गया था। यहां तक कि इस सदमे की वजह से अमित भाई की विधानसभा क्षेत्र के एक निवासी ने आत्महत्या कर ली। इस घटना ने अमित भाई को इतना द्रवित किया कि उन्होंने माधेपुरा बैंक के पुनरूद्धार का बीड़ा उठाते हुये लक्ष्य प्राप्ति तक दाढ़ी ट्रिम न करने का प्रण किया। इस प्रयास में उन्होंने राज्य के सहकारिता से जुड़े प्रमुख लोगों, राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर की वित्तीय संस्थाओं से सम्पर्क साध कर एक प्रभावी योजना बनायी और माधुपुरा बैंक को वापस पटरी पर लाने में सफलता प्राप्त की। बैंक के पुनरूद्धार के साथ-साथ उन्होंने “डिपाजिट इंश्योरेंस योजना’’ लाकर बैंक के खातेदारों और डिपोजिटर्स के 400 करोड़ रूपये वापस दिलाये।